प्रसिद्ध सूफी संत हज़रत सैयद जिलानी सरकार गढ़चिरौली का विसाल, नमाज़-ए-जनाज़ा आज 28 सितंबर को बाद नमाजे जोहर, निधन से शोक की लहर

Passing of the renowned Sufi saint Hazrat Syed Jilani Sarkar of Gadchiroli; *Namaz-e-Janaza* (funeral prayer) to be held today, September 28, after the *Fajr* prayer; news of his demise has caused a wave of grief.

प्रसिद्ध सूफी संत हज़रत सैयद जिलानी सरकार गढ़चिरौली का विसाल, नमाज़-ए-जनाज़ा आज 28 सितंबर को बाद नमाजे जोहर, निधन से शोक की लहर

गड़चिरौली शरीफ : इंतिहाई अफसोस के साथ यह खबर दी जा रही है कि गड़चिरौली शरीफ के बुजुर्ग-ए-दीन हज़रत सय्यद अहमद जिलानी सरकार इस दुनिया-ए-फानी से पर्दा फरमा कर अपने खालिक-ए-हकीकी से जा मिले. उनके इंतकाल की खबर से उनके चाहने वालों, मुरीदीन और अकीदतमंदों में गम की लहर दौड़ गई.
हज़रत की वफात पर अकीदतमंदों ने गहरे रंज का इजहार करते हुए अल्लाह तआला से दुआ की कि अल्लाह तआला हज़रत के दरजात बुलंद फरमाए. उनकी मगफिरत फरमाए और उन्हें अपनी खास रहमत व करम से नवाजे. आमीन या रब्बल आलमीन
साथ ही तमाम चाहने वालों, मुरीदीन और अकीदतमंदों को इस सदमे पर सब्र-ए-जमील अता फरमाने और उनके दिलों को सब्र व सुकून से भरने की दुआ की गई. जानकारी के मुताबिक हज़रत के नमाज़-ए-जनाज़ा तारीख 28 सितंबर 2026 दिन पीर को बाद नमाज़-ए-जोहर अदा की जाएगी.
आपकी पाक सूरत, नेक अख़लाक, इल्म और करामात हमेशा हमारे दिलों में याद रहेंगी. आपका जाना समाज और चाहने वालों के लिए एक अपूरणीय क्षति है. उनके चाहने वाले वाले सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहीं पुरे देश में मौजूद हैं.
हजरत के अंतिम दर्शन के लिए प्रदेश और दुसरे राज्यों से बड़ी तादाद में श्रद्धालु उनके निवास पर लगातार पहुंच रहे हैं. आने वाले श्रद्धालुओं की गाड़ियों को काफी दूर खड़ा किया जा रहा है. ताकि रास्ता जाम न हो.
बता दें कि गड़चिरौली शरीफ महाराष्ट्र में है. यानी छत्तीसगढ़ के बॉर्डर के पास है. रायपुर से गढ़चिरौली की सड़क मार्ग से दूरी लगभग 280 से 291 किलोमीटर है. कार या टैक्सी से जाने में लगभग 6 से 6.5 घंटे लगते हैं. यह मार्ग आमतौर पर राजनांदगांव और छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र सीमा से होकर गुजरता है. बस सेवा: बस से यह यात्रा पूरी करने में करीब 9 से 10 घंटे का समय लग सकता है.
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जीवन और आध्यात्मिक यात्रा आध्यात्मिक गुरु (पीर): जिलानी सरकार हैदराबाद (तेलंगाना) में पहाड़ी शरीफ दरगाह के प्रसिद्ध सूफी संत हजरत बाबा शराफ उद्दीन सहरवर्दी (रहमतुल्लाह अलैह) को अपना पीर मानते थे.
गढ़चिरौली में आगमन और तपस्या: गढ़चिरौली आने से पहले उन्होंने वहां के घने जंगलों में कठिन आध्यात्मिक साधना और रियाज़त (तपस्या) की.
निवास: करीब 1996 में वे जंगलों से निकलकर सबसे पहले बंदू मदावी नामक व्यक्ति के घर आए और कुछ दिन रुके. इसके बाद वे इकबाल अहमद के घर चले गए. जो आगे चलकर बाबा की खानकाह (आश्रम/दरगाह) में बदल गया और यही उनका स्थायी निवास स्थान बना.
वार्षिक उर्स और ख्याति: गढ़चिरौली में हर साल उनका जन्मदिन और उर्स (सालाना जलसा) बहुत धूमधाम से मनाया जाता है. जिसमें देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु (अकीदतमंद) उनकी एक झलक पाने और आशीर्वाद लेने आते थे.
जीवन और चमत्कार
संत का जन्म हबीब मोहसिन के रूप में संभवतः भारत के हैदराबाद के पास हुआ था. सूत्रों के मुताबिक गढ़चिरोली में अपने वर्तमान स्थान पर बसने से पहले उन्होंने कई साल तक जंगल में ध्यान किया था. संत को उनके हिंदू और मुस्लिम दोनों अनुयायी समान रूप से सम्मान देते हैं. भक्त संत को पान (सुपारी के पत्ते) चढ़ाते हैं. गढ़चिरोली में उनकी खानकाह में जिन्न, काला जादू आदि के कई पीड़ित अक्सर देखे जाते हैं.
हालांकि संत से कई चमत्कार जुड़े हुए हैं. लेकिन उनके शिष्यों के बीच सबसे चर्चित चमत्कार उच्च वोल्टेज बिजली के तार से संबंधित है. जिसमें संत ने अपने शरीर पर उच्च वोल्टेज बिजली का तार लपेटकर गढ़चिरोली के लोगों को एक बड़े हादसे से बचाया था. उनके बेटे सैयद हबीब हुसैन उर्फ ​​हुसैन बाबा हैं.
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