स्कूलों में मंत्रोच्चार अनिवार्य करने के फैसले पर विवाद, मनीष कुंजाम बोले- आदिवासी समाज हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं, बच्चों पर जबरदस्ती थोपा गया नियम
Controversy over the decision to make mantra chanting mandatory in schools; Manish Kunjam states that the tribal community is not part of Hinduism and the rule has been forcibly imposed on children.
रायपुर छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में नया शैक्षणिक सत्र के साथ लागू किए गए 10 तरह के मंत्रों के जाप को लेकर जमकर विरोध शुरु हो गया है. छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में वैदिक मंत्रोच्चार अनिवार्य किए जाने के फैसले को लेकर आदिवासी समाज, मसीह समाज (क्रिश्चियन वेलफेयर सोसायटी) और कांग्रेस ने कड़ा विरोध जताया है.
प्रदेश के बस्तरिया राज मोर्चा के नेता और पूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने प्रेस कांफ्रेंसकर इस व्यवस्था का विरोध करते हुए कहा कि बच्चों पर जबरन धार्मिक गतिविधियां थोपी जा रही हैं. मनीश का कहना था कि आदिवासी समाज हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं है और सरकार RSS के एजेंडे पर काम कर रही है.
शिक्षा व्यवस्था में धार्मिक रंग भरने का आरोप
मनीष कुंजाम ने कहा कि यह मामला केवल किसी एक जिले तक सीमित नहीं है. बल्कि पूरे प्रदेश के सरकारी स्कूलों से जुड़ा हुआ है. उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी सरकार शिक्षा व्यवस्था में धार्मिक रंग भरने का कोशिश कर रही है. जिससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होगी। उनका कहना है कि स्कूलों में सुबह से लेकर छुट्टी तक अलग-अलग समय पर कुल 10 मंत्रों का जाप कराया जा रहा है. जिसे अनिवार्य बनाया गया है.
स्कूल शुरू होते ही कराया जाता है मंत्रों का पाठ
पूर्व विधायक ने बताया कि स्कूल शुरू होने के साथ ही बच्चों से छह मंत्रों का पाठ कराया जाता है. इसके अलावा दिनभर अलग-अलग मौकों पर मंत्रों का उच्चारण कराया जा रहा है. इनमें राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के साथ दीप मंत्र, सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र, महापुरुषों की जीवनी का वाचन, मध्यान्ह भोजन के समय भोजन मंत्र और छुट्टी के समय गायत्री मंत्र और शांति मंत्र शामिल हैं.
शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को ज्ञान देना है
मनीष कुंजाम ने कहा कि शिक्षा का मकसद बच्चों को ज्ञान देना है. न कि किसी विशेष धार्मिक परंपरा को उन पर थोपना. उन्होंने सरकार से इस निर्णय पर पुनर्विचार करने की मांग की है.
साथ ही कहा कि आदिवासी समाज की अपनी अलग पहचान, संस्कृति और परंपराएं हैं. जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. इस मुद्दे को लेकर प्रदेश में राजनीतिक बहस तेज हो सकती है. फिलहाल सरकार की ओर से इस बयान पर कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.
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अदालत का रुख करेगी मसीह समाज
छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में वैदिक मंत्रोच्चार अनिवार्य किए जाने के फैसले को लेकर कांग्रेस और मसीह समाज (क्रिश्चियन वेलफेयर सोसायटी) ने कड़ा विरोध जताया है.
मसीह समाज की कोर्ट जाने की चेतावनी
क्रिश्चियन वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष क्रिस्टोफ़र पॉल ने इस फैसले को भारतीय संविधान के खिलाफ बताया है. उन्होंने मांग किया कि ईसाई धर्म के बच्चों और शिक्षकों को इस नियम से मुक्त रखा जाए. अगर सरकार इस फैसले को वापस नहीं लेती है, तो मसीह समाज इसके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाएगा.
RSS की शाखा बनाने का प्रयास -कांग्रेस
पूर्व पीसीसी चीफ धनेंद्र साहू ने आरोप लगाया कि सरकार के इस फैसले से स्कूलों का माहौल बिगड़ेगा। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार सरकारी स्कूलों को RSS की शाखा में बदलने की कोशिश कर रही है. कांग्रेस का मानना है कि भारत हमेशा से एक सर्वधर्म समभाव वाला देश रहा है. स्कूलों में किसी एक धर्म के मंत्रोच्चार से दूसरे धर्म के लोग भी इसी तरह की मांग करेंगे. जिससे शैक्षणिक माहौल प्रभावित होगा.
स्कूल प्रबंधकों और शिक्षकों में असंतोष
रिपोर्ट के मुताबिक कई स्कूलों के प्रबंधक और शिक्षक भी दबी जुबान में इस फैसले से नाखुश हैं. उनका मानना है कि इससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होगी.
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RUFC ने कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन
बिलासपुर : छत्तीसगढ़ के स्कूलों में दीप मंत्र, सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र, भोजन मंत्र, गायत्री मंत्र एवं शांति मंत्र के पाठ संबंधी निर्देशों को लेकर अल्पसंख्यक संगठन RUFC ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है. संगठन की बिलासपुर इकाई के पदाधिकारियों एवं लीगल टीम की बैठक में इस विषय पर विस्तृत चर्चा के बाद न्यायालय का रुख करने का फैसला लिया गया।.
संगठन का कहना है कि अगर स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा जारी उक्त निर्देश को वापस नहीं लिया जाता है. तो इसे अदालत में चुनौती दी जाएगी. संगठन के मुताबिक सरकारी और अनुदान प्राप्त विद्यालयों में किसी विशेष धर्म से जुड़े मंत्रों एवं धार्मिक गतिविधियों को अनिवार्य रूप से शामिल करना संविधान की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था तथा नागरिकों के धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से संबंधित गंभीर विषय है.
बैठक में मौजूद पदाधिकारियों ने कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श लेने के बाद फैसला लिया कि मामले की संवैधानिक वैधता को लेकर अदालत में याचिका दायर करने की तैयारी की जाएगी. इसके लिए संगठन की लीगल टीम को आवश्यक कानूनी प्रक्रिया शुरू करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है.
इसी कड़ी में 18 जून 2026 को संगठन के जिला अध्यक्षरकीब अंसारी और फाउंडर सदस्य ताहिर हुसैन अंसारी ने सरगुजा कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर उक्त निर्देश पर तत्काल रोक लगाने और शासन स्तर पर पुनर्विचार करने की मांग की.
ज्ञापन में कहा गया है कि प्रदेश के सभी वर्गों और समुदायों के विद्यार्थियों को ध्यान में रखते हुए शिक्षा व्यवस्था को संविधान की मूल भावना के अनुरूप संचालित किया जाना चाहिए. संगठन ने शासन से मांग किया है कि किसी भी तरह के विवाद की स्थिति से बचने के लिए इस आदेश की समीक्षा की जाए.
RUFC ने साफ किया है कि वह संविधान और कानून के दायरे में रहकर अल्पसंख्यक समुदाय के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखेगा और जरुरत पड़ने पर अदालत का दरवाजा खटखटाएगा.
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