करोड़ों की जमीन पर ‘मौत’ के दस्तखत! मृतकों से कराई गई रजिस्ट्री, बेनामी खेल का पर्दाफाश, रायपुर मे बड़ा लैंड स्कैम

Signature of 'death' on land worth crores! Registry done by dead people, benami game exposed, big land scam in Raipur

करोड़ों की जमीन पर ‘मौत’ के दस्तखत! मृतकों से कराई गई रजिस्ट्री, बेनामी खेल का पर्दाफाश, रायपुर मे बड़ा लैंड स्कैम

रायपुर : राजधानी रायपुर में कानून, राजस्व और रजिस्ट्री तंत्र को धता बताते हुए भूमाफियाओं ने ऐसा खेल खेला है. जिसे सुनकर आपके होश उड़ जाएंगे. यहां करोड़ों की बेशकीमती ज़मीन पर फर्जी दस्तावेज, मृत लोगों के नाम की पॉवर ऑफ अटॉर्नी और नकली पहचान पत्रों से ज़मीन की रजिस्ट्री कर दी गई. पुलिस, रजिस्ट्री ऑफिस और राजस्व महकमा इस खुलासे के बाद कठघरे में है. लेकिन सब चुप हैं… सवाल पूछने पर या तो पल्ला झाड़ लिया जाता है या जुबान सिल जाती है.
सड़क पर ठेला लगाने वाले के नाम रजिस्ट्री, करोड़ों की ज़मीन पर कब्जा,
राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित डूमरतराई की वह जमीन जिसकी कीमत आज करोड़ों में है उसे शीतल दास मखीजा के मुताबिक सिंधी समाज के 9 लोगों के नाम पर खरीदा गया था. लेकिन यहां शुरु होता है खेल – जिन 9 लोगों के नाम थे. उनमें से 3 मर चुके थे. और चौंकाने वाली बात ये मर चुके लोगों से पॉवर ऑफ अटॉर्नी पर दस्तखत करवाए गए. फर्जी आधार-पैन कार्ड तैयार कर ‘प्रशांत शर्मा’ नामक व्यक्ति को यह जमीन ट्रांसफर कर दी गई.
फर्जी पॉवर ऑफ अटॉर्नी बना, फिर दो बार बेची गई जमीन, सब कुछ कागज़ों में
पहले गजानंद मेश्राम को 1.70 करोड़ में ज़मीन बेची गई. फिर विशाल शर्मा और महेश गोयल को 2.41 करोड़ में बेच दी गई. लेकिन जमीन तो वहीं रही. पैसों का लेन-देन सिर्फ कागज पर हुआ. न नकद, न बैंक ट्रांजैक्शन. सबसे बड़ा सवाल – गजानंद और विशाल का पता एक ही क्यों है? मकान नंबर भी हूबहू एक जैसा?
कौन है प्रशांत शर्मा? कौन है गजानंद मेश्राम? असली हैं या नकली?
शीतल मखीजा का दावा है कि ये सब नाम केवल पर्दे के पीछे बैठे दलालों और भूमाफियाओं के मुखौटे हैं. ये लोग ठेले, रिक्शा और पंचर दुकान चलाने वालों को पैसे का लालच देकर सामने लाते हैं. और फिर करोड़ों की ज़मीन उनके नाम कर देते हैं. राजधानी की ज़मीन की पॉवर ऑफ अटॉर्नी पाटन (जिला दुर्ग) से क्यों बनी? क्या यह किसी बड़े घोटाले का हिस्सा है?
थाना माना और रजिस्ट्री ऑफिस दोनों मौन, पर साजिश साफ
थाना माना कहता है – मखीजा को बयान के लिए बुलाया गया. मखीजा कहते हैं आज तक एक बार भी मुझे कोई नोटिस नहीं मिला. दूसरी तरफ पाटन रजिस्ट्री ऑफिस के अधिकारी कैमरे के सामने मुंह नहीं खोलते. लेकिन दबी ज़ुबान में कबूल करते हैं “ये सब पुराने उप-पंजीयक के समय हुआ.
क्या करोड़ों की ज़मीन यूं ही फर्जी दस्तावेजों से लूटी जाएगी?  क्या सरकार और प्रशासन इस ‘भूमि घोटाले’ पर कोई कड़ा एक्शन लेगा या सब कुछ रफा-दफा कर दिया जाएगा?
आखिर क्यों चुप हैं जिम्मेदार?
क्या प्रशासन ने भूमाफियाओं के सामने हथियार डाल दिए हैं? इस पूरे घोटाले में प्रशासनिक चुप्पी सबसे ज्यादा खतरनाक है. जब रजिस्ट्री ऑफिस, पुलिस और राजस्व महकमा आंख मूंद ले तो समझ लीजिए कि भूमाफियाओं ने सिस्टम को खरीद लिया है. ये सिर्फ एक जमीन का मामला नहीं. ये राजधानी रायपुर के भ्रष्ट सिस्टम की धज्जियां उड़ाने वाला मामला है. अब सवाल उठता है क्या मौत के बाद भी किसी के दस्तखत हो सकते हैं?
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