न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिंदुस्तां वालों, तुमहारी दास्तां भी न रहेगी दास्तानों में

Article : आज पूरे देश पर मनुवादी और पूनजीवादी तत्वों का कब्ज़ा हो जाने के कारण स्थानीय लोगों की स्थिति बद से बदतर और दयनीय हो गई है। इसलिए इस बोसीदा मनुवादी और पूनजीवादी व्यवस्था को खत्म किये बिना भारत के मूल निवासियों का विकास संभव नहीं है।

न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिंदुस्तां वालों, तुमहारी दास्तां भी न रहेगी दास्तानों में

मनुवाद और पुंजीवाद सभी बुराइयों की जड़ हैं, इन्हें हर जगह से उखाड़ फेंकने की ज़रूरत हैः ,म-डब्ल्यू-अंसारी आईपी,स (सेवानिवृत्त डीजी)

Article : आज पूरे देश पर मनुवादी और पूनजीवादी तत्वों का कब्ज़ा हो जाने के कारण स्थानीय लोगों की स्थिति बद से बदतर और दयनीय हो गई है। इसलिए इस बोसीदा मनुवादी और पूनजीवादी व्यवस्था को खत्म किये बिना भारत के मूल निवासियों का विकास संभव नहीं है। मनुवादी और पूनजीवादी व्यवस्था की जड़ें बहुत मज़बूत हैं क्योंकि यह भारत की प्राचीन शोषणकारी सोच है जिसने हर युग में गरीबों और पिछड़े लोगों का बहुत शोषण किया है। आज़ादी के बाद भी यह विचार समाज में बढ़ता ही रहा, इसने समाज के हर वर्ग में अपनी जड़ें मजबूत कर लीं और हर राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन में इस मनुवादी और पूनजीवादी विचार धारको ने गरीबों का शोषण क्या है। इस फिक्र के हामिलीन ने पिछड़ों को पिछड़ा ही रहने देने के लिए पूरी ताकत लगा दी है। आज जो भी पार्टी है सब में इसी फिक्र के लोग शामिल होकर पिछड़ों और गरीबों का शोषण कर रहे हैं।

इस फिक्र के लोगों ने पिछड़ों को पिछड़ा और पसमांदा ही रहने देने के लिए पूरी ताकत लगा दी है। मनुवादी और पूनजीवादी तत्व हर जगह, सभी कार्यालयों में, सभी राजनीतिक दलों में पाए जाते हैं। चाहे वो कांग्रेस हो, बीएसपी हो, चाहे वो आरजेडी हो, बीजेपी हो, आप हो, टीएमसी हो, जेडीयू हो, सीपीआई हो, कोई भी पार्टी हो, हर छोटी-बड़ी पार्टी में मनुवादी और पूंजीवादी तत्व ज़रूर पाए जाते हैं। याद रहे कि भाजपा खालिस मनुवादी-पुंजवादी पार्टी है और अन्य पार्टियां उसकी बी टीम हैं। इसलिए एससी-एसटी, दलित और ओबीसी को बीजेपी और आरएसएस से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। गौरतलब है कि अलग-अलग विचारधारा की पार्टियों और संगठनों होने के बावजूद भी सभी मनुवादी पुंजीवादी तत्व चाहे वे नेता हों, उस्ताद हों, बैरोकेट हों, सामाजिक कार्यकर्ता हों, चाहे वे कोई भी हों, अपने मूल विचारों (मूल विचारधारा) पर कायम रहते हैं और इसके प्रचार और संरक्षण के लिए कड़ी मेहनत भी करते हैं, फिर चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन वे केवल अपने मुख्य लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

यह विचारधारा गरीबों, वंचितों व निम्न वर्ग को सबसे अधिक प्रभावित करती है और यही वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होता है, मनुवादी पूंजीवदी के तत्व चाहे हिंदू हों या मुस्लिम, इसका नुकसान और नुक्सान सबसे ज्यादा दलित मुस्लिम, यूबीसी मुस्लिम, एससी-एसटी और सभी पिछड़े लोगों को होता है। दलित मुस्लिम, ओबीसी मुस्लिम को शिक्षा, व्यापार, रोजगार, आजीविका और आत्मरक्षा के लिए सहयोग करने की जरूरत है और सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता दिखाने और अपना नेतृत्व विकसित करने के लिए एक मंच पर आएं। आने वाले चुनाव में अगर राजनीतिक दल जनसंख्या के अनुपात में टिकट नहीं देते हैं तो उन्हें खुलकर इसका विरोध करना चाहिए और अपने उम्मीदवार चुनाव में उतारने चाहिए।

पसमांदा तबकात को जात-पात, ऊंच-नीच, जात-बिरादरी से बाहर निकलकर आपस में रोजी-रोटी, बेटी का रिश्ता बनाना होगा। साथ ही आगामी चुनावों के लिए पिछड़े वर्ग का एजेंडा एक समान होना चाहिए और इन चुनावों में उनके महत्वपूर्ण मुद्दों को सामने लाकर उन्हें लागू करने का प्रयास किया जाना चाहिए। एजेंडे में संविधान आदेश 1950 के पैरा 3 के तहत मुस्लिम और ईसाई अनुसूचित जाति के खिलाफ असंवैधानिक भेदभाव को समाप्त करना भी शामिल होना चाहिए। इस प्रस्ताव की मांग लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, सीएस रेड्डी, सुश्री मायावती आदि ने भी की है। इसके अलावा रंगनाथ मिश्रा आयोग, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने भी इस मांग का समर्थन किया। इसके अलावा, 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण का उपविभाजन सबसे पिछड़े वर्गों को लगभग 18-20 प्रतिशत आरक्षण देता है।

ताकि ईबीसी को उनकी आबादी के अनुपात में उचित हिस्सा मिल सके। पिछड़े समुदायों सहित एससी-एसटी और ओबीसी के साथ उनकी जनसंख्या हिस्सेदारी के आधार पर राजनीतिक, आर्थिक और शैक्षणिक संस्थानों में सत्ता-साझाकरण का प्रावधान। विधान मंडल में महिलाओं के लिए 33 फीसद आरक्षण के तहत ओबीसी महिलाओं के लिए 27 फीसद का उप-कोटा आरक्षित किया जाना चाहिए। विकास बजट का 27 फीसद ओबीसी के लिए विशेष घटक योजना होनी चाहिए। अधिसूचित कृषि वस्तुओं, विशेषकर गेहूं, चावल, दालें, तिलहन और मोटे अनाज के लिए किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी। एमएसपी की गारंटी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक मजदूरों को वेतन की कानूनी गारंटी मिली। चपरासी, ड्राइवर, वार्ड बॉय, नर्स, पुलिस और अर्धसैनिक बलों आदि की वर्दी के लिए हैण्डलूम-पावरलूम और खादी के कपड़ों की खरीद तथा चिकित्सा और अन्य विभागों के लिए तौलिए, चादरें आदि की खरीद की व्यवस्था की जानी चाहिए। इसके अलावा दलित मुस्लिम/ओबीसी मुस्लिम महिलाओं के लिए 27 से 33 फीसदी हिस्सेदारी आरक्षित की जानी चाहिए।

दलित मुस्लिम, ओबीसी मुस्लिम को अपने हक के लिए आवाज उठानी चाहिए। कानूनी लड़ाई भी लड़नी चाहिए। आरक्षण के लिए भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाना चाहिए। याचिका दायर कर मांग की करना चाहिए कि सभी राजनीतिक दल जनसंख्या के अनुपात में टिकट तकसीम करें।  ये देश की अखंडता और गंगा जमनी तेहज़ीब के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा एजेंडे में उन सभी मौजूदा मुद्दों को भी शामिल किया जाना चाहिए जो सीधे तौर पर पसमांदा वर्ग से जुड़े हैं।