उजाले की आस में खून से लिखी पुकार, बिजली के लिए ग्रामीणों ने बहा दिया लहू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और NTCA को भेजे 500 से ज्यादा दर्द भरा पत्र

A plea written in blood in the hope of light; villagers shed blood for electricity, sending over 500 heart-wrenching letters to Prime Minister Narendra Modi and the NTCA.

उजाले की आस में खून से लिखी पुकार, बिजली के लिए ग्रामीणों ने बहा दिया लहू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और NTCA को भेजे 500 से ज्यादा दर्द भरा पत्र

गरियाबंद : गरियाबंद जिले के मैनपुर क्षेत्र स्थित उदंती-सीतानदी अभ्यारण्य के भीतर बसे गांवों के ग्रामीणों का सालों पुराना दर्द अब खून से लिखी चिट्ठियों के रूप में सामने आया है. बिजली जैसी मूलभूत सुविधा की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे सैकड़ों ग्रामीणों ने अड़गड़ी ग्राम में इकठ्ठा होकर अपने शरीर से खून निकालकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के नाम मार्मिक पत्र लिखे.
ग्रामीणों का कहना है कि वे पिछले करीब दो दशक से बिजली की मांग कर रहे हैं. लेकिन अब तक उनकी समस्या का समाधान नहीं हो पाया है. लगातार ज्ञापन, आवेदन और धरना-प्रदर्शन के बाद भी जब कोई ठोस नतीजा नहीं निकला तो लोगों ने अपनी पीड़ा देश के सर्वोच्च स्तर तक पहुंचाने के लिए यह अनोखा और भावनात्मक तरीका अपनाया.
सैकड़ों लोगों ने दिया खून, लिखे 500 से ज्यादा पत्र
अड़गड़ी गांव में आयोजित इस अभियान में युवाओं, बुजुर्गों और महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. ग्रामीणों ने अपनी उंगलियों से खून निकालकर कोरे कागजों पर अपनी व्यथा लिखी और बिजली की सुविधा उपलब्ध कराने की गुहार लगाई. बताया जा रहा है कि 500 से ज्यादा पत्र तैयार किए गए हैं. जिन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण को भेजा जाएगा. पत्रों में ग्रामीणों ने लिखा है कि आजादी के दशकों बाद भी वे अंधेरे में जीवन बिताने को मजबूर हैं. बच्चों की पढ़ाई, किसानों की जरूरतें, स्वास्थ्य सुविधाएं और रोजमर्रा का जीवन बिजली के अभाव में गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है.
2006 से जारी है संघर्ष
ग्रामीणों के मुताबिक वर्ष 2006 से इस क्षेत्र में बिजली पहुंचाने की मांग लगातार उठाई जा रही है. इस दौरान हजारों आवेदन और ज्ञापन प्रशासन तथा जनप्रतिनिधियों को सौंपे गए. कई बार धरना-प्रदर्शन और आंदोलन भी किए गए. लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है. ग्रामीणों का आरोप है कि हर बार उन्हें आश्वासन तो मिला. लेकिन बिजली के खंभे और तार गांवों तक नहीं पहुंच सके. अभ्यारण्य क्षेत्र होने के कारण विभिन्न नियमों और अनुमतियों का हवाला देकर मामला टाल दिया जाता रहा.
सुशासन तिहार में भी नहीं निकला समाधान
हाल ही में आयोजित सुशासन तिहार के दौरान भी ग्रामीणों ने अपनी मांग प्रशासन के सामने रखी थी. ग्रामीणों का कहना है कि सुनवाई के दौरान जिला प्रशासन ने बताया कि मामला केंद्र स्तर पर लंबित है और अंतिम अनुमति वहां से मिलनी है. इसके बाद ग्रामीणों ने सीधे केंद्र सरकार और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण तक अपनी आवाज पहुंचाने का फैसला लिया.
“बिजली नहीं, तो विकास कैसे?”
ग्रामीणों का कहना है कि डिजिटल इंडिया और विकसित भारत की बात हो रही है. लेकिन उनके गांव आज भी अंधेरे में डूबे हैं. मोबाइल चार्ज करने से लेकर बच्चों की पढ़ाई तक के लिए लोगों को कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी बिजली के अभाव में प्रभावित होती है. ग्रामीणों ने उम्मीद जताई है कि खून से लिखे गए ये पत्र देश के नीति-निर्माताओं का ध्यान उनकी तरफ आकर्षित करेंगे और सालों से लंबित बिजली की मांग पर जल्द फैसला लिया जाएगा.
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