असली अध्यक्ष को लेकर फंस गया पेंच, बृजमोहन या गजेंद्र, बीजेपी के अंदर जंबूरी पर जंग, 400 टॉयलेट्स के नाम पर 88 लाख रुपये की वसूली!
There is a problem regarding the real president, Brijmohan or Gajendra, war within BJP over Jamburi, recovery of Rs 88 lakh in the name of 400 toilets!
रायपुर : छत्तीसगढ़ स्काउट गाइड का असली अध्यक्ष कौन है. यह वो सवाल है जो इस समय छत्तीसगढ़ की राजनीति में उबाल लाए हुए है. सांसद बृजमोहन अग्रवाल का दावा वैधानिक अध्यक्ष को लेकर है. वहीं गजेंद्र यादव स्कूल शिक्षा मंत्री के नाते पदेन अध्यक्ष बन गए हैं.
छत्तीसगढ़ स्काउट एवं गाइड परिषद को लेकर निर्वाचित अध्यक्ष सांसद बृजमोहन अग्रवाल और पदेन अध्यक्ष बन गए मंत्री गजेंद्र यादव के बीच के विवाद में शुक्रवार को दिल्ली से आए स्काउट एवं गाइड के राष्ट्रीय अध्यक्ष वरिष्ठ भाजपा नेता अनिल जैन ने बृजमोहन अग्रवाल के दावे को खारिज कर दिया. द सूत्र के पास वो दस्तावेज आए हैं जिसमें ये नियम संशोधन है कि स्काउट गाइड के अध्यक्ष कार्यकाल 5 साल रहेगा. इस लिहाज से बृजमोहन अग्रवाल 2029 तक वैधानिक अध्यक्ष के लिए निर्वाचित हैं.
बृजमेाहन ने लगाए भ्रष्टाचार के आरोप
बृजमोहन अग्रवाल ने नेशनल रोवर रेंजर जंबूरी में सीधे 15 करोड़ के भ्रष्टाचार के आरोप ही नहीं लगाए हैं. बल्कि गजेंद्र यादव की नियुक्ति को भी अवैधानिक कहा है. बृजमोहन अग्रवाल ने सीधा आरोप लगाया है कि बालोद में जंबूरी के आयोजन के लिए टेंट से लेकर भोजन व्यवस्था तक के काम हो जाने के बाद टेंडर जारी किए गए और अपने एक चहते ठेकेदार/सप्लायर को ही काम दिलवाया गया.
प्रदेश की भाजपा सरकार भी अपनी ही पार्टी के सांसद के लगाए आरोपों पर चुप है. सूत्र कहते हैं कि बृजमोहन अग्रवाल के आरोपों में एक यह भी है कि राज्य सरकार से राष्ट्रीय जंबूरी के लिए जारी की गई 10 करोड़ रुपयों की राशि स्काउट एवं गाइड के खाते में जमा होने की बजाए आयोजन के जिले बालोद के जिला शिक्षा अधिकारी के खाते में जमा कर दी गई. पदेन अध्यक्ष गजेंद्र जैन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दिग्गज पदाधिकारी रह चुके बिसरा राम यादव के बेटे हैं.
इस नाते गजेंद्र यादव को छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक पार्टी संगठन से जुड़े लोगों का साथ मिल रहा है. ऐसी चर्चा है लेकिन पहली बार विधायक बने गजेन्द्र यादव का अपना राजनीतिक कद बृजमोहन अग्रवाल के मुकाबले बेहद छोटा है. ऐसे में भाजपा की राजनीति के प्रेक्षक इस बात पर भी हैरान हैं कि पार्टी छत्तीसगढ़ के अपने एक अत्यंत प्रभावशाली नेता की आपत्तियों को दरकिनार कर उनके लिए असुविधाजनक स्थिति ही खड़ी कर रही है.
बृजमोहन को मनाने की कोशिश
वहीं बृजमोहन अग्रवाल को मनाने की कोशिशें भी शुरु हो गई हैं. डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने उनसे मुलाकात की. यह मुलाकात बंद कमरे में लंबी चली। जानकारी तो यहां तक है कि विजय शर्मा ने पहले जंबूरी जाने का दौरा बना लिया था. लेकिन इस विवाद के बाद उन्होंने जंबूरी से दूरी बना ली. वहीं गजेंद्र यादव कहते हैं कि बृजमोहन अग्रवाल उनके लिए बड़े भाई के समान हैं. उनसे मिलकर सारी स्थिति साफ की जाएगी.
दस्तावेज के मुताबिक भारत स्काउट एंड गाइड छत्तीसगढ़ ने 8.10.2024 को परिषद की बैठक में सभी सदस्यों की आम सहमति से राज्य के उप नियम में आवश्यक संशोधन करने के लिए प्रस्ताव पारित किया था. संशोधन में यह साफ किया गया था कि आने वाले 5 साल तक राज्य अध्यक्ष बृजमोहन अग्रवाल रहेंगे.
उपनियम के कंडिका 10 के अनुसार शिक्षा मंत्री को संरक्षक पद के लिए आमंत्रित किया जाएगा. इस संशोधन के अनुमोदन करने के लिए 21.12.2024 को भारत स्काउट्स एंड गाइड्स छत्तीसगढ़ ने राष्ट्रीय मुख्यालय को पत्र लिखा था. जिसके जवाब में 15.04.2025 को एक पत्र के जरिए राष्ट्रीय मुख्यालय ने सक्षम अधिकारी द्वारा सभी संशोधन को स्वीकृति देकर अनुमोदित करने की जानकारी दी थी.
अब आगे क्या
यह पूरा विवाद अब हाईकोर्ट पहुंच गया है. बृजमोहन अग्रवाल ने गजेंद्र यादव की नियुक्ति को हाईकोर्ट में चैलेंज किया है. जल्द ही हाईकोर्ट इस मामले की सुनवाई करेगा. इसके बाद ही तय हो पाएगा कि आखिर राज्य स्काउड गाइड का असली अध्यक्ष कौन है. बहरहाल बीजेपी तो इस मामले में दो फाड़ हो ही गई है. बालोद में जंबूरी का आयोजन तो चल रही रहा है. इसका उद्घाटन राज्यपाल डेका ने किया. वहीं सीएम विष्णुदेव साय ने इस आयोजन की खूब तारीफ की है.
निष्कर्ष :
यह पूरा विवाद यह बताता है कि किस तरह संवैधानिक संस्थाओं का राजनीतिक उपयोग या दुरुपयोग किया जाता है. ऐसी संस्थाओं में वर्चस्व के लिए एक ही पार्टी में विवाद की नौबत आ जाती है. इसमें मुश्किल ये भी है कि पार्टी को दो फाड़ होना पड़ता है. इसलिए राजनीतिक अहम से दूर होकर ऐसी संस्थाओं को युवाओं के हित में काम करने पर फोकस करना चाहिए.
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साय सरकार के दो साल में पार्टी के भीतर ही यह सबसे बड़ा विवाद बन गया है. जिसमें बृजमोहन अग्रवाल ने शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव को छत्तीसगढ़ स्काउट गाइड परिषद का पदेन अध्यक्ष बनाए जाने को चुनौती दी है। इस नियुक्ति के खिलाफ वे अदालत तक चले गए. लेकिन भाजपा खामोश है.
संगठन के नेता कहते हैं, हमें इस मामले में चुप रहने को कहा गया है. जिन मंत्री गजेंद्र यादव पर आरोप लगा है. उनके पिता बिसरा राम यादव राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी रह चुके हैं. संघ तो सामान्य तौर पर ऐसे किसी मामले में खुलकर अपनी राय रखता नहीं है. लेकिन जो दर्ज हो रहा है वह यह कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, भाजपा संगठन और छत्तीसगढ़ सरकार इनमें से कोई भी इस विवाद का पटाक्षेप नहीं करवा पा रहा है. क्योंकि भाजपा के सूत्र बताते हैं कि बृजमोहन अग्रवाल के लिए यह प्रतिष्ठा की भी लड़ाई बन गई है और दूसरी तरफ पिता की वजह से पार्टी और सरकार में रसूख रखने वाले मंत्री गजेंद्र यादव भी बैकफुट पर आने को तैयार नहीं हैं.
भारत स्काउट्स एंड गाइड्स के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल जैन साफ तौर पर बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ गजेंद्र यादव के पक्ष में खड़े हो गए. गजेंद्र यादव की पदेन अध्यक्ष पद पर नियुक्ति का जो आदेश वायरल है. उसमें यह लिखा हुआ है कि इस नियुक्ति को मुख्यमंत्री ने अनुमोदित किया है.
सरकार के जानकार सूत्र कहते हैं कि सामान्यत: इस तरह के आदेश में ‘मुख्यमंत्री द्वारा अनुमोदित’ जैसी बात का उल्लेख नहीं होता है. चर्चा यह है कि क्या अफसरों ने मुख्यमंत्री को अंधेरे में रख इस तरह के आदेश पर उनका अनुमोदन ले लिया.. या अफसरों पर ऐसा करने का दबाव था. तो मुख्मंत्री द्वारा अनुमोदित पंक्ति अपना बचाव करने के लिए लिख दी गई.
सत्ता के गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि अगर शिक्षा मंत्री प्रदेश के स्काउट एंड गाइड परिषद के पदेन अध्यक्ष होंगे तो क्या उन कुछ दिनों में जब मंत्रालय का प्रभार खुद मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के पास था, क्या तब वे प्रदेश स्काउट एंड गाइड के पदेन अध्यक्ष थे.
अगर अब तक इस घटनाक्रम पर नजर डालें तो जंबूरी शुरु हो गई है, जो 13 जनवरी तक चलेगी. दूसरी तरफ इस मामले में जब हाई कोर्ट में सुनवाई का समय आया तो जज ने इसे अगली पेशी में सुनने की बात कही. अगली सुनवाई 13 जनवरी को है जिस दिन जंबूरी खत्म हो रहा है.
बृजमोहन अग्रवाल और छत्तीसगढ़ सरकार के बीच स्काउट गाइड के छत्तीसगढ़ परिषद के अध्यक्ष पद को लेकर चल रही खींचतान पर मिडिया ने जब भाजपा का पक्ष जानने की कोशिश की तो भाजपा प्रवक्ताओं ने एक लाइन में यह बात कही कि इस मामले में पार्टी ने कुछ भी कहने से मना किया है.
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400 टॉयलेट्स के नाम पर 88 लाख रुपये की वसूली
बालोद : छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में आयोजित भारत स्काउट्स एंड गाइड्स की राष्ट्रीय जंबूरी में भ्रष्टाचार और सरकारी नियमों की खुली अवहेलना का मामला सामने आया है. जंबूरी स्थल पर पांच दिन के लिए 400 टॉयलेट, मूत्रालय और नहाने की अस्थायी व्यवस्था के नाम पर भारी धनराशि वसूली गई. सूत्रों के मुताबिक जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) ने 5 जनवरी 2026 को जंबूरी संबंधी कार्यों के लिए आदेश जारी किए थे. हालांकि इसके करीब दो महिना पहले ही अमर भारत किराया भंडार के संचालक जसपाल ने बिना किसी आधिकारिक आदेश के टेंट, तंबू, लाइट और पानी जैसी व्यवस्थाओं का काम शुरु कर दिया था. इससे यह सवाल उठता है कि क्या टेंडर प्रक्रिया वास्तविक थी. और अगर थी तो यह काम किस आधार पर अनुमति के बिना शुरु किया गया.
रिपोर्ट के मुताबिक 400 टॉयलेट की व्यवस्था के लिए 88 लाख रुपये वसूले गए. जबकि एक टॉयलेट के लिए 22,000 रुपये चार्ज किए गए थे. जो बाजार दर से तकरीबन चार गुना ज्यादा है. वहीं करीब 5 करोड़ 19 लाख रुपये के टेंडर में से शौचालय, मूत्रालय और नहाने की अस्थायी व्यवस्था के लिए 1.62 करोड़ रुपये की राशि की वसूली की गई. बेहद चिंताजनक बात यह है कि अमर भारत किराया भंडार को टेंडर मिलने से पहले ही जंबूरी स्थल पर काम शुरु करने की अनुमति मिली. जबकि अन्य निविदाकर्ता जैसे एक्सिस कम्युनिकेशन और भारत किराया भंडार को यह पता था कि बिना आदेश काम करना सरकारी नियमों का उल्लंघन है. फिर भी वे काम शुरु नहीं कर सके. सूत्रों के मुताबिक अमर भारत किराया भंडार के संचालक जसपाल को पहले से यह यकीन था कि मंत्री जी की कृपा से उसे यह टेंडर मिलेगा.
इसके बावजूद उसने दरें बाजार मूल्य से चार गुना ज्यादा रखी. इस तरह की व्यवस्था ने साफ किया कि सिर्फ आर्थिक अनियमितता ही नहीं, बल्कि एक संगठित साजिश के तहत सरकारी नियमों की अवहेलना की गई और जनता के पैसे की बर्बादी हुई. यह मामला सिर्फ बालोद जिले का नहीं, बल्कि पूरे राज्य प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र की जांच की जरुरत को उजागर करता है. इसमें मंत्री और उनके करीबी सहयोगियों द्वारा कथित रुप से मिलीभगत की बात सामने आई है. वहीं जंबूरी स्थल पर कार्यों के शुरु होने से कई अन्य निविदाकर्ताओं के लिए निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा का अवसर खत्म हो गया. यह कदम न सिर्फ वित्तीय अनियमितता का प्रतीक है. बल्कि सार्वजनिक विश्वास और सरकारी नियमों की अनदेखी का स्पष्ट उदाहरण भी बन गया है.
विशेषज्ञ और सामाजिक संगठन इस मामले में मांग कर रहे हैं कि इसकी निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की जाए. दोषियों को सजा देकर भविष्य में ऐसे भ्रष्टाचार और जनता के धन की लूट की पुनरावृत्ति रोकी जा सके. बालोद राष्ट्रीय जंबूरी में हुए इस खुलासे ने प्रशासनिक निगरानी की कमियों और सरकारी नियमों की अवहेलना के गंभीर पहलुओं को उजागर किया है. अब सभी की निगाहें राज्य सरकार और जांच एजेंसियों पर टिकी हैं कि वे इस मामले में कितनी सख्ती से कार्रवाई करते हैं. इस तरह के मामलों से यह साफ होता है कि बड़ी परियोजनाओं में पारदर्शिता और समय पर निगरानी न होने से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है. जनता और सामाजिक संगठन इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही की मांग कर रहे हैं.
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