गांधीजी की जान बचाने वाले बतख़ मियाँ अंसारी को आज तक नही मिला इंसाफ, क्या भारत और भारत की न्यायपालिका से इंसाफ की उम्मीद छोड़ दी जाए: एम. डब्ल्यू. अंसारी
मारने वाले से बचाने वाला हमेशा बड़ा होता है और जो अपनी जान और धन का बलिदान देकर किसी की जान बचाता है वह हमेशा के लिए अमर हो जाता है और ज़ाहिर तौर पर ऐसे सभी मौकों पर जो बड़ा होता है उसे याद किया जाएगा, लेकिन हमारे देश भारत में मामला कुछ अलग ही नहीं बल्कि बरअक्स है।
मारने वाले से बचाने वाला हमेशा बड़ा होता है और जो अपनी जान और धन का बलिदान देकर किसी की जान बचाता है वह हमेशा के लिए अमर हो जाता है और ज़ाहिर तौर पर ऐसे सभी मौकों पर जो बड़ा होता है उसे याद किया जाएगा, लेकिन हमारे देश भारत में मामला कुछ अलग ही नहीं बल्कि बरअक्स है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को आज पूरी दुनिया जानती है और उनका हत्यारा भी उतना ही प्रसिद्ध हैं जितने कि स्वयं महात्मा गांधी। उनके हत्यारे का नाम भी पूरी दुनिया जानती है। लेकिन जिस शख्स ने अपनी जान की परवाह किए बिना अपनी जान जोखिम में डालकर गांधीजी की जान बचाई, आज उसका नाम तक कोई नहीं जानता। आज वह शख्सियत गुमनाम हो गई है। वह महान शख्सियत है बख्त मियां अंसारी (उर्फ बतख़ मियाँ अंसारी)
पिछले कई सालों से उन्हें और उनके परिवार को न्याय दिलाने के लिए भारत के कोने-कोने से आवाजें़ उठ रही हैं। विशेष रूप से रघुठाकुर सहित कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस मुद्दे को कई बार कई मंच पर उठाया है और विजय तिवारी, अरुण दीक्षित, श्री लज्जा शंकर हरदनिया आदि सहित कई वरिष्ठ पत्रकारों ने भी अपनी आवाज़ उठाई है। भारत में साप्ताहिक, त्रैमासिक या मासिक शायद ही कोई अखबार हो जिसने इस अन्याय के खिलाफ दिल्ली से लेकर पटना तक आवाज़ न उठाई हो। हर साल लोग गांधी जी की जयंती और शहादत दिवस पर उनके साथ हुए अन्याय को याद करते हैं। लेकिन इसके बावजूद भी नतीजा शून्य ही है, इस समस्या का जवाब या समाधान किसके पास है? इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है? मोहसिने गांधी और उनके परिवार को न्याय कब मिलेगा?
इतिहास की किताबों में लिखा है कि कैसे बतख मियां अंसारी ने गांधीजी की जान बचाई, ब्रिटिश अधिकारी ने गांधीजी को रात के खाने पर आमंत्रित किया और अपने बावर्ची बतख मियां को गांधीजी को जहरीला दूध देने के लिए कहा, लेकिन बतख मियां ने उनकी साजिश का पर्दाफाश कर दिया और इस तरह गांधीजी की जान बचा ली। बतख मियां अंसारी को अंग्रेज़ों के हाथों क्रूर हिंसा का सामना करना पड़ा। उन्हें न केवल उनकी ज़मीन से बेदखल किया गया बल्कि जेल की कोठरी में डाल दिया गया और जेल में उनके साथ वह सब कुछ हुआ जो उस समय के सभी मुजाहिदीने आज़ादी के साथ होता था। बतख़ मियां ने गांधीजी को तो बचा लिया लेकिन बदले में उन्हें बहुत कष्ट सहना पड़ा। उन्हें देशभक्ति की भारी कीमत चुकानी पड़ी।
यह भी उल्लेखनीय है कि स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने बतखमियां अंसारी से खुश होकर उन के परिवार को 35 बीघा ज़मीन देने का वादा किया था जो आज तक उनके परिवार को नहीं मिली है। क्योंकि वह एक गरीब किसान थे। अब उनका परिवार खुशहाल स्थिति में नहीं है। अगर यही स्थिति किसी अमीर, नवाब या किसी प्रभावशाली व्यक्ति के परिवार की होती तो अब तक उन्हें वह ज़मीन मिल गई होती जिसका वादा राष्ट्रपति ने किया था।



